DOSTI AISE HI HOTI H

विश्वास के कोमल धागों से है बनता, रिश्तो का संसार |
ज्ञान नहीं, धन नहीं, प्रेम है जीवन का आधार ||

जो प्रेम, स्वार्थ की सीमाओं से परे, करे, वो दोस्त |
खाली जीवन को, स्वर्णिम लम्हों से करे, हरे भरे, वो दोस्त ||

वो दोस्त, समझ हो जिसे, दोस्त की हर धड़कन की |
वो दोस्त, समझ हो जिसे, इस अटूट बन्धन की ||

यह तन नश्वर, जीवन नश्वर, है नश्वर यह संसार |
जो मिटे नहीं, रहे अमर सदा, वो है, दोस्ती – एक अमूल्य उपहार
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माना, तू अजनबी है और मैं भी, अजनबी हूं डरने की बात क्या है ज़रा मुस्कुरा तो दे

Aansoo Main Na Dhoondna Humein,Dil Main Hum Bas Jaayenge,Tamanna Ho Agar Milne Ki,To Band Aankhon Main Nazar Aayenge.Lamha Lamha Waqt Guzer Jaayenga,Chund Lamhoo Main Daaman Choot Jaayega,Aaj Waqt Hai Do Baatein Kar Lo Humse,Kal Kiya Pata Koun Apke Zindagi Main Aa Jayega.Paas Aakar Sabhi Door Chale Jaate Hain,Hum Akele The Akele Hi Reh Jaate Hain,Dil Ka Dard Kisse Dikhaaye,Marham Lagane Wale Hi Zakhm De Jaate Hain,Waqt To Humein Bhula Chuka Hai,Muqaddar Bhi Na Bhula De,Dosti Dil Se hum Isiliye Nahin Karte,Kyunke Darte Hain,Koi Phir Se Na Rula De,Zindagi Main Hamesha Naye Loug Milenge,Kahin Ziyada To Kahin Kam Milenge,Aitbaar Zara Soch Kar Karna,Mumkin Nahi Har Jagah Tumhe Hum Milenge.Khushbo Ki Tarah Aapke Paas Bikhar Jayenge,Sukon Ban kar Dil Me Utar Jayenge,Mehsoos Karne Ki Koshish To Kijiye,Door Hote Howe Bhi Pass Nazer Aayenge..!

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Sunday, January 31, 2010

संकल्प-2

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रस तो सदा है
संकल्प रूपी,
नीरस ही होते
विकल्प सारे।
इसी रस से
गढ़ती है
मूरत सजन की
बना देती उसको
छवि प्रियतम की,
देती है आकार
शिला को जैसे
बनकर हथौड़ी
कलाकार जैसी,
तभी निखरता है
रूप उसका,
घर के बाहर
बनती है पहचान,
चलता है
अपनी ड़गर पर
होता है तब
संकल्पित
मन उसका भी।
लुटाने लगता है
वह भी प्रेम
बदले में,
छूटने लगता है
अहंकार
उसका भी
छंट जाते हैं
विकल्पों के बादल,
पाता है
पूर्णता की मधुरता,
स्वपिल जीवन,
एक नई आस
नया क्षितिज
और एक नया
जीवन साथी।
छोड़कर मनमानी,
बहना प्रवाह में
अपनाता मर्यादा
होता है लज्जित
गलत काम करके,
यह लज्जा ही
बनती है
संकल्प घर का,
रोकती है ये
पशुभाव से
अविद्या
के योग से
अधंकार प्रवेश से,
यही तो है
संकल्प पत्नी का,
प्रवेश कर गया
पति-ह्वदय में।
इसी ने रोका
अधोगति को,
गिरने से नीचे,
इसी से बनी
सीढ़ी
उठने को ऊपर,
इसी से उपजा
रति भाव मन में,
इसी ने किया मुक्त
पितृ ऋणों से।
संकल्प बोला
गर्भस्थ शिशु से
आना है तुमको
बनकर एक मानव,
तुम्हे बनना माली
इस परिवार का
करने हैं पूरे
सपने संसार के।
बिना संकल्प
कहां मानव मिलेगा,
किसी एक घर में,
नहीं उतरेगा
कोई देव
इस देह में
बनने को मानव,
जीने उस घर में
सौ साल तक,
वहां तो पशु हैं,
असुर हैं
क्लेश हैं तैयार
आने को
नर शरीर में,
जीने को
स्वच्छन्द रहकर।
उन्हें रोकता यह
संकल्प पत्नी का,
बना देती
उसको मानव
जन्म से पहले,
जन्म बाद में
करती है
दीक्षित उसे
परम्पराओं में
विरासत में,
देखती रहती है
पहचान अपनी
उसके भविष्य में,
बनाती उसे
प्रतिबिम्ब अपना,
रखने को सदा
गर्व से सिर ऊंचा।
सोचो, क्या हो
यदि टूट जाए
यह संकल्प
जीवन का,
कौन-सा संकल्प
बड़ा होगा इससे
क्या होगी दशा
उस मन की
जो दौड़ता है
विकल्पों के पीछे,
कौन-सा संकल्प
बच पाएगा
उसके मन में,
कैसे बनेगा
मन पटु उसका,
बहता रहेगा
एक प्रवाह बनकर,
हवा के संग-संग
किसके सहारे
टिकेगा भवन
यदि कमजोर होगी
नींव संकल्प की,
खण्ड़हर ही होगा
बस जीवन सारा,
कैसे लौट पाएगा
कोई “अपने घर को”
जहां से चला था
84 लाख चक्कर
पशु भाव से
आता है जीव
मानव बनकर
जीकर मर्यादा में
और छोड़कर
सारी मर्यादाएं
बन जाता है
फिर से पशु,
शुरू होगा क्रम
आने-जाने का
फिर से।
कैसे जी गए
पहले के लोग
इस संकल्प से
न शिक्षा थी
न चकाचौंध ऎसी,
शरीर था ऎसा ही,
क्या बदला फिर
जमाने में ऎसा,
व्यक्ति भूल बैठा
सार इस जन्म का,
अटका ही रहा
अर्थ में
देह की खातिर
नश्वर हैं दोनों
कहां चेतना है,
तभी तो पशु है
नया आदमी
सुप्त चेतना लिए
चल रहा नींद में
पता नहीं कहां।
जागरण के लिए
चाहिए नया
संकल्प मन का,
छिपा है यह तो
शक्ति बनकर
भीतर सबके,
माया है यही तो,
त्रिगुण बनी है,
तोड़ना है बन्धन
इसी के जगत में,
जीवन के सुख-दुख
इसी के बनाए,
पिछले जन्म का भी
लेखा दिखाए,
संकल्प जोड़े,
संकल्प तोड़े,
संकल्प सहजता,
प्रखरता,
विश्वास बनता
यही स्वयं पर,
तभी करता है
शासन जगत पर,
क्यों दोष देना
कभी भी किसी को
यदि न हो
संकल्प,
विश्वास खुद पर
वही दिखता है
दूसरे मुख पर
प्रतिबिम्ब पर,
लौटते हैं
स्पन्दन हमारे ही
व्यवहार बनकर
पास अपने।
संकल्प करता है
शिकार किसी का,
यही कराता है
समर्पण भी जग में,
यही एक बूता है
जीवन में सबको
जिसके सहारे
जीता है मानव
पकड़कर इसे ही
जीवन के पथ पर।
बिना संकल्प
कैसे निभेगा रिश्ता
कैसे बंधेगा
कोई किसी से
दोनों ही मुक्त
एक-दूसरे से,
दृष्टि बस तन तक,
अर्थ पर हो
बुद्धि,
छलांगें लगाए
मन-उपवन में,
तृष्णा ही तृष्णा
ईष्र्या ही ईष्र्या,
नशा ही नशा
गफलत ही गफलत,
कहां आश्रम
कोई जीवन में
ठहरे,
कहां धर्म की
कोई पहचान होती,
आसक्ति छाए
चारों दिशा में
परिग्रह बनकर
पशुभाव घेरे
चारों तरफ बस
अंधेरे-अंधेरे,
ना कोई बचता
मातृत्व मन में
ना कोई रहता
मानव इस तन में।
छूट जाते सारे
यश-कीर्ति भी,
भाव सारे ही
लोक हित के।

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