DOSTI AISE HI HOTI H

विश्वास के कोमल धागों से है बनता, रिश्तो का संसार |
ज्ञान नहीं, धन नहीं, प्रेम है जीवन का आधार ||

जो प्रेम, स्वार्थ की सीमाओं से परे, करे, वो दोस्त |
खाली जीवन को, स्वर्णिम लम्हों से करे, हरे भरे, वो दोस्त ||

वो दोस्त, समझ हो जिसे, दोस्त की हर धड़कन की |
वो दोस्त, समझ हो जिसे, इस अटूट बन्धन की ||

यह तन नश्वर, जीवन नश्वर, है नश्वर यह संसार |
जो मिटे नहीं, रहे अमर सदा, वो है, दोस्ती – एक अमूल्य उपहार
There was an error in this gadget
There was an error in this gadget

माना, तू अजनबी है और मैं भी, अजनबी हूं डरने की बात क्या है ज़रा मुस्कुरा तो दे

Aansoo Main Na Dhoondna Humein,Dil Main Hum Bas Jaayenge,Tamanna Ho Agar Milne Ki,To Band Aankhon Main Nazar Aayenge.Lamha Lamha Waqt Guzer Jaayenga,Chund Lamhoo Main Daaman Choot Jaayega,Aaj Waqt Hai Do Baatein Kar Lo Humse,Kal Kiya Pata Koun Apke Zindagi Main Aa Jayega.Paas Aakar Sabhi Door Chale Jaate Hain,Hum Akele The Akele Hi Reh Jaate Hain,Dil Ka Dard Kisse Dikhaaye,Marham Lagane Wale Hi Zakhm De Jaate Hain,Waqt To Humein Bhula Chuka Hai,Muqaddar Bhi Na Bhula De,Dosti Dil Se hum Isiliye Nahin Karte,Kyunke Darte Hain,Koi Phir Se Na Rula De,Zindagi Main Hamesha Naye Loug Milenge,Kahin Ziyada To Kahin Kam Milenge,Aitbaar Zara Soch Kar Karna,Mumkin Nahi Har Jagah Tumhe Hum Milenge.Khushbo Ki Tarah Aapke Paas Bikhar Jayenge,Sukon Ban kar Dil Me Utar Jayenge,Mehsoos Karne Ki Koshish To Kijiye,Door Hote Howe Bhi Pass Nazer Aayenge..!

Search This Blog

Monday, July 5, 2010

प्रेम तो शक्ति है, उसे अपनी कमजोरी न बनने दें

हमारी कमजोरियां हमें न सिर्फ नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि पतन भी करा देती हैं। श्रीराम के पिता राजा दशरथ की कमजोरी रानी कैकेयी थीं। राजा दशरथ ने कोप भवन में बैठी रानी को मनाने के लिए ऐसे वचन कहे थे- प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥ यानि कि हे प्रिये, मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सारी सम्पत्ति, पुत्र और यहां तक कि मेरे प्राण ये सब तेरे अधीन हैं। तू जो चाहे मांग ले पर अब कोप त्याग, प्रसन्न होजा। यह राजा की कमजोरी थी। कैकेयी की कमजोरी उनकी दासी मंथरा थी जो कि स्वभाव से ही लालची थी। करइ बिचारू कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती॥ वह दुर्बुद्धि, नीच जाति वाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकार से यह काम रातोंरात बिगड़ जाए। श्रीराम के राजतिलक के पूर्व कैकेयी ने मंथरा की बात सुनी, उसके बहकावे में आ गईं और दशरथ से भरत के लिए राजतिलक तथा श्रीराम के लिए वनवास मांग लिया। अपनी कमजोरी के वश में आकर कैकेयी ने रामराज्य का निर्णय उलट दिया और तो और, दासी का सम्मान करते हुए कहा - करौ तोहि चख पूतरि आली। यदि मेरा यह काम होता है, मैं तुझे अपनी आंखों की पुतली बना लूंगी। मनुष्य अपनी ही कमजोरी के वश में होकर गलत निर्णय लेता है और इसी कमजोरी को पूजने लगता है।



श्रीरामचरितमानस में एक प्रसंग आता है कि जब श्रीराम वनवास चले गए, दशरथ का निधन हो गया और भरत तथा शत्रुघ्न अपने ननिहाल से लौटे तब मंथरा पर शत्रुघ्न ने प्रहार किया था। हुमगि लात तकि कू बर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा ''उन्होंने जोर से कुबड़ पर एक लात जमा दी और वह मुंह के बल जमीन पर गिर पड़ी।'' इसमें प्रतीक की बात यह छिपी है कि जो कमजोरी पर प्रहार करता है वह शत्रुघ्न कहलाता है और हमें अपने शत्रु का नाश ऐसे ही करना चाहिए। लोभ हमारा सबसे बड़ा शत्रु है, कमजोरी है इसे बक्शना नहीं चाहिए। वरना जो लोग कमजोरियों को ढोते हैं एक दिन वह कमजोरी उनको पटकनी दे देती है।

No comments:

Post a Comment